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व्यापार घाटा कम करने को मोदी सरकार की रणनीति तैयार

नई दिल्ली -अमेरिका तथा चीन के बीच जारी ट्रेड वॉर के बीच चीन में उत्पादन कर रही कई विदेशी कंपनियां पेइचिंग छोड़कर कहीं और अपनी फैक्ट्री लगाना चाहती हैं। यह भारत के लिए बेहतर मौका है, जिसे भुनाने के लिए भारत सरकार ने ठोस रणनीति तैयार की है। जानते हैं इसके बारे में विस्तार से। भारत ने चीन के बाजार में अपने कृषि उत्पादों की पहुंच बढ़ाने और दवाओं के निर्यात को बढ़ावा देने के लिए रणनीति तैयार कर ली है। साथ ही, उसने अमेरिका तथा चीन के बीच व्यापारिक युद्ध के मद्देनजर चीन से अपने मैन्युफैक्चरिंग बेस को हटाने की इच्छा रखने वाली विदेशी कंपनियों को लुभाने के लिए एक ठोस रणनीति को भी अमली जामा पहनाया गया है।

केंद्रीय वाणिज्य विभाग के रणनीतिक दस्तावेज का उद्देश्य चीन के साथ व्यापार घाटे को कम करना, इलेक्ट्रॉनिक्स, टेलिकॉम, इलेक्ट्रिकल इक्विपमेंट और फार्मास्यूटिकल्स के आयात का विकल्प तलाशने के लिए क्षेत्रवार रणनीति तैयार करना है। चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा वित्त वर्ष 2018 में रेकॉर्ड 63.04 अरब डॉलर रहा है।

2017 में ही शुरू हुआ रणनीति पर काम -सितंबर 2017 में मंत्रालय का कार्यभार ग्रहण करने के बाद ही सुरेश प्रभु चीन के साथ व्यापार घाटे को कम करने को लेकर रणनीति तैयार करने के लिए खुद दिशा-निर्देश देने का काम कर रहे थे। इस रणनीति का उद्देश्य चीन को निर्यात बढ़ाना और लोकल मैन्युफैक्चरिंग के जरिये आयात कम करना है।
दूरसंचार विभाग के अनुसार चीन भारतीय कंपनियों के साथ कई तरह के भेदभाव करता है और उनके खिलाफ प्रतिबंध लगाता है। उद्योग ने प्रिंटेड सर्किट बोर्ड और कैमरा मॉड्यूल की लोकल मैन्युफैक्चरिंग तथा क्षेत्र के लिए एक रिसर्च ऐंड डेवलपमेंट फंड तैयार करने का सुझाव दिया है।

सोलर पावर पर भी रणनीति तैयार -सोलर पावर के मामले में विभाग ने कहा है कि भारत को प्रतिस्पर्धी बोलियों के जरिये ‘रिंगफेंस गवर्नमेंट प्रोक्योरमेंट’ तथा पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप मोड में यहां प्लांस सेटअप करने की जरूरत है।

ऑटो कंपोनेंट्स भी लिस्ट में -ऑटो कंपोनेंट्स के लिए दस्तावेज में कहा गया है कि यूरोपिय संघ तथा अमेरिकी गुणवत्ता को टक्कर देने वाले स्टैंडर्ड और कॉमन टेस्टिंग फैसलिटिज की स्थापना से स्थानीय उत्पादन को मजबूती मिलेगी।

टैरिफ, नॉन टैरिफ बैरियर्स -दस्तावेज एशिया पैसिफिक ट्रेड अग्रीमेंट (सात एशियाई देशों के बीच एक समझौता) में टैरिफ में कमी और प्रस्तावित आरसीईपी के जरिये निर्यातकों को समर्थन प्रदान करता है। विभाग के मुताबिक, चीन में भारतीय औषधी कंपनियों को नियामकीय बाधाएं सहनी पड़ती हैं और उन्हें ड्रग रजिस्ट्रेशन के लिए लंबे समय तक इंतजार करना पड़ता है। उन्हें रजिस्ट्रेशन के वक्त विस्तृत रूप से क्लिनिकल ट्रायल डेटा सौंपने और ड्रग फॉर्म्यूलेशन प्रॉसेस का खुलासा करने के लिए कहा जाता है।

इंटरफेस बनाने पर होगा विचार -इस मामले में मंत्रालय भारत तथा चीन के खाद्य एवं औषधि प्रशासन के बीच एक इंटरफेस बनाने पर विचार करेगा। इसका उद्देश्य रेग्युलेटरी स्टैंडर्ड्स तथा चीन में डॉजियर्स फाइलिंग की प्रक्रिया पर नियमित रूप से ट्रेनिंग प्रोग्राम करना तथा प्रॉडक्ट रजिस्ट्रेशन में अभी लगने वाले 3-5 साल के वक्त को घटाकर एक साल पर लाना होगा।

भारत में कंपनियों को शिफ्ट करने की ठोस रणनीति- सूत्रों के अनुसार  ‘अपनी व्यापक आबादी के साथ भारत चीन से अपना मैन्युफैक्चरिंग बेस हटाने की इच्छा रखने वाली कंपनियों के लिए अच्छा गंतव्य है। साथ ही, भारत में निर्माण को बढ़ाने को लेकर मैन्युफैक्चरिंग यूनिट लगाने की इच्छा रखने वाली चीनी कंपनियों के लिए भी यह बढ़िया जगह है।’ इलेक्ट्रॉनिक्स, कंज्यूमर अप्लायंसेज, कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स, टेक्सटाइल्स, हेल्थकेयर इक्विपमेंट और हेवी इंडस्ट्री जैसे क्षेत्रों की कंपनियां अपनी मैन्युफैक्चरिंग इकाई चीन से हटाकर भारत में लगा सकती हैं।

संजीव बरारा ,वरिष्ठ पत्रकार

अमूल दूध अब 2 रुपये प्रति लीटर महंगा

नई दिल्ली -मंगलवार से अमूल का दूध दो रुपये प्रति लीटर की दर से महंगा मिलेगा। कंपनी ने दूध का दाम बढ़ाने का फैसला किया है और कहा है कि नई दरें कल यानी मंगलवार से लागू हो जाएंगी। न्यूज एजेंसी एएनआई ने अमूल ब्रैंड की कंपनी जीसीएमएमएफ लि. के एमडी आरएस सोढी से बात कर इसकी जानकारी दी।

तेल आयात, खपत में कमी देश में आर्थिक मंदी का संकेत 

भारत में तेल आयात अनुमान में मंद वृद्धि दर देश में लंबी आर्थिक सुस्ती का संकेत है। सरकार की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस साल तेल आयात में 3.5 फीसदी की वृद्धि का अनुमान है। भारत को अपनी तेल की जरूरतों का 80 फीसदी से ज्यादा आयात करना पड़ता है, ऐसे में तेल का आयात कम होने से मांग और खपत में सुस्ती का संकेत मिलता है।

पेट्रोलियम मंत्रालय के अधीन पेट्रोलियम प्लानिंग एंड ऐनालिसिस सेल के अनुसार, देश का तेल आयात वित्त वर्ष 2019 के 22.7 करोड़ टन के मुकाबले 2020 में 23.3 करोड़ टन रह सकता है। तेल आयात की दर सुस्त होना सरकार के खजाने के लिए अच्छी खबर है, लेकिन कच्चे तेल का आयात कम होने से भारतीय तेल शोधक कारखानों को कम तेल मिलेगा और पेट्रोल, डीजल व विमान ईंधन (एटीएफ) की खपत में कमी आएगी।
वर्ष 2018 की शुरुआत में सुधार के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था में फिर वित्त वर्ष 2018-19 की तीसरी तिमाही में सुस्ती देखी गई और सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) विकास दर घटकर 6.6 फीसदी पर आ गई। अर्थव्यवस्था में आई सुस्ती के कारण वित्त वर्ष 2019 में आर्थिक विकास दर अनुमान 7.2 फीसदी से घटाकर सात फीसदी कर दिया गया।

अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने भी भारत की आर्थिक विकास दर अनुमान वित्त वर्ष 2020 में घटाकर 7.3 फीसदी रहने का अनुमान जारी किया है। सूत्रों की माने तो ‘तेल आयात की दर कम होने से भारत के तेल आयात बिल में कटौती होगी और इससे चालू खाता घाटा का प्रबंधन करने में मदद मिलेगी, लेकिन यह तेल के मौजूदा दाम का एक कारण होगा। अगर खाड़ी देशों में तनाव के कारण कच्चे तेल के दाम में उछाल आता है तो इससे देश की अर्थव्यवस्था की रफ्तार और सुस्त पड़ सकती है।’

चुनावी रुझान केआंकड़ों से रुपया हाई रेट पर

नई दिल्ली : जैसे ही देश में मोदी लहर के अनुरूप अनुकूल परिणाम आये रुपये में डॉलर के मुकाबले जोरदार उछाल आ गया । सोमवार को  रुपया 73 पैसे की मजबूती के साथ 69.49 रुपये प्रति डॉलर पर खुलने के बाद 69.43 रुपये प्रति डॉलर पर बना हुआ था, जबकि शुरुआती कारोबार के दौरान रुपया पिछले सत्र के मुकाबले 86 पैसे की बढ़त बनाते हुए 69.36 रुपये प्रति डॉलर तक उछला। पिछले सत्र में रुपया डॉलर के मुकाबले 70.22 रुपये प्रति डॉलर पर बंद हुआ था।

कमोडिटी बाजार विश्लेषको की माने तो चुनाव के नतीजों को लेकर जारी रायशुमारी से कारोबारी रुझान मजबूत हुआ है इसलिए देसी करेंसी रुपये में मजबूती आई है। अधिकांश रुझानों में भाजपा की अगुवाई में राजग को पूर्ण बहुमत मिलने की संभावना जताई गई है।

शेयर बाजार में भी सोमवार को तेजी का रुख देखा गया। प्रमुख सूचकांक सेंसेक्स सुबह 9.41 बजे 725.18 अंकों की मजबूती के साथ 38,655.95 पर और निफ्टी भी लगभग इसी समय 208.55 अंकों की बढ़त के साथ 11,615.70 पर कारोबार करते देखे गए।

(इनपुट IANS से)